विश्व बाल श्रम निषेध दिवस विशेष :- हिंदी सिनेमा में बाल संवेदनाएं
डेस्क। फिल्में कला जगत की वह माध्यम बन गई हैं जो समय समाज और परिवेश को बहुत ही गहराई और जीवंतता के साथ चित्रित करती हैं। समाज के विभिन्न विमर्श यहांँ विश्लेषण पाते हैं परंतु यह भी सच है की सिनेमा का व्यवसायिक पक्ष ऐसे संदर्भों को प्रभावित करता है क्योंकि आज सिनेमा उद्योग बन चुका है। परंतु सच्चे और अच्छे सिनेकार की पहली भूमिका और उसकी सार्थकता कुछ इस रूप में स्मरणीय रहती है कि उनके द्वारा बनाई गई फिल्मों में, और फिल्मों से, समाज किस रूप में और कैसे प्रभावित होता है। गौ़र करने योग्य है।
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कुछ ऐसा ही पहलू है हिंदी फिल्मों का बाल चित्रण या फिर उन संवेदनाओं का फिल्मांकन, जो बच्चों के उस भाव बोध को रेखांकित करते हैं जिसके केंद्र में होते हैं बचपन के खट्टे-मीठे दुख भरे दर्द और उम्मीद व सपनों से ढका हुआ मन। घर परिवार की परंपरागत वृत्तियों से निकलकर ये यतीम नये आकाश की तलाश करते हैं, यह तलाश हर उस बच्चे की होती है जो अपने गमों की स्याही से अपनी तकदीर लिखता है। वह रचता है वह वातावरण, जो उसे बाल मजदूरी करने के लिए विवश करता है। पेट पालने की वह मज़बूरी जिसमें उसके शिक्षा संस्कार को धूमिल कर दिया। वह दर्द भरी दास्तान जिसमें फटकार और चंद रोटियों के टुकड़ों की भूख छुपी हुई होती है। '

देर रात में सोता हूं ,कप और प्याली धोता हूं
रोते-रोते हंसता हूं , हंसते-हंसते रोता हूं।।
कैलाश सत्यार्थी द्वारा संचालित 'बचपन बचाओ की रिपोर्ट बताती है कि भारत में लगभग 7 से 8 करोड़ बच्चे अनिवार्य शिक्षा से वंचित हैं। अधिकतर बच्चे संगठित अपराध रैकेट का शिकार होकर, बाल मजदूरी के लिए मजबूर किए जाते हैं जबकि बाकी बच्चे गरीबी के कारण स्कूल नहीं जा पाते हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 5 से 14 साल के 26 करोड़ बच्चों में से एक करोड़ बाल श्रम के शिकार हैं।
इन सब यथार्थ संवेदनाओं के अतिरिक्त कुछ ऐसी भी फिल्में बनी हैं जिनमें पति पत्नी की रागात्मक कटुता ,उनके सुनहरे बचपन को छीन लेती है । प्रेम और ममता के इस असंतुलित परिवेश वह नितांत अकेला हो जाता है (पीहू) और डूब जाता है ऐसी कुठाओं में जो उसे पूरे जीवन सालती हैं।
मेरे आलेख का उद्देश्य बस इन संवेदनाओं को ही उठाना है, उन बातों का जिक्र करना है जिनसे बाल्य जीवन बहुत गहरे से प्रभावित हो रहा है । हम सब जानते हैं कि भले ही भारत में बाल फिल्म सोसाइटी बनी हुई है। जिसमें बाल केंद्रित विचारों और संदर्भों को बखूबी रूप से चित्रित किया जाता है परंतु सच्चाई अभी कोसों दूर है यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं की गिनती भर की फिल्मों के अलावा बाल जीवन पर बहुत ही कम काम हुआ है। प्रसिद्ध गीतकार फिल्मकार गुलजार के शब्दों में-
हमारे देश में बच्चों के प्रति सामाजिक भेदभाव और गै़र बराबरी बहुत है। पढ़ाई के समय खाने के कारण 50 बच्चों की मौत हो जाए । बहुत कड़वाहट है ।अफसोस भी होता है बच्चों की फिल्में बन रही हैं पर गिनती की। "
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यकीनन ! देश में बाल सिनेमा को वह स्थान नहीं मिल सका है जो उसे मिल जाना चाहिए था, लेकिन इसके बावजूद भी बच्चों को लेकर जो फिल्में बनी हैं वो कमोबेश स्वीकारीय हैं। राजकपूर, गुलजार, महमूद से लेकर आमिर खान और, विशाल भारद्वाज, इरफान कमल, नीलमाधव पांडा आदि ने यथासंभव ऐसा सिनेमा रचा जिनमें बच्चों की भावनाओं को केंद्र में रखा गया। नन्हे मुन्ने, जागृति, मुन्ना , बूट पॉलिश,आवारा , तूफान और दिया, काबुलीवाला, दोस्ती, दो कलियांँ , मासूम,दो बीघा जमीन, ब्लू अंब्रेला,किताब, परिचय ,अनोखा बंधन, रानी और लालपरी, कुंवारा बाप , समाज को बदल डालो, मकड़ी, तारे जमीन पर, स्टेनली का डिब्बा , स्लमडॉग मिलियनियर, बम बम बोले, चिल्लर पार्टी, मिस्टर इंडिया, गट्टू , इक़बाल, सतरंगी पैराशूट, मासूम, स्टेनली का डब्बा, आई एम कलाम, भूतनाथ ,पाठशाला, नन्हें जैसलमेर, थैंक्स माँ, फरारी की सवारी, अपना आसमान, अब दिल्ली दूर नही , बाल गणेश, मकड़ी, ब्लू अम्ब्रेला, चेन खुली की मेन खुली, राजू चाचा, निल बटे सन्नाटा, वेलडन अब्बा , पढना जरूरी है, अलीफ, जंगल बूक, जलपरी , अंजली, धनक, दो दूनी चार, जजंतरम ममंतरम, आबरा का डाबरा, पा, स्पर्श, सीक्रेट सुपरस्टार जलपरी, रामचंद्र पाकिस्तानी, हिचकी , आर्टिकल 15, सिद्धार्थ ,पीहू, साउंड आफ साइलेंस, नोटबुक , परीक्षा आदि फिल्मों का कथानक बच्चों की ज़िन्दगी के इर्दगिर्द घूमता है । नई भाव-भूमि पर उपजी ये फिल्में बाल बिषयक संभावनाओं का नया धरातल पैदा करती हैं। मनोविज्ञान का नया पाठ पाती हैं। बाल विश्लेषण को एक नया आधार देती हैं। कुछ सोचने और समझने को मजबूर करती हैं।
आवारा का राज एक ऐसे बालक की भूमिका में है जो झुग्गी झोपड़ियों में पलने वाले बाल अपराध की ओर इशारा करता है। बाल जीवन का वह दर्द जो उस जैसे इतने ही बच्चों ने भोगा होगा। अबोध व भूखे बालक राज का रोटी चुराने वाला दृश्य व्यक्ति को अंदर तक झकझोर कर रख देता है। तो वहीं 'बूटपॉलिश' का भेलू और भोला दोनों भाई बहन अनाथ हैं। परिस्थितियां उन्हें भीख मांगने को मजबूर करती हैं परंतु वह भीख ना मानकर मेहनत का कुछ खाना पसंद करते हैं। फिल्म कई संवेदनात्मक मोड़ देती है
" चाचा मुझे रोज रोज भूख क्यों लगती है "
बालक का यह कथन बाल मन के कितने ही संवेगों को उजागर करता है। यह सही है कि भूख और अत्यंत गरीबी इन जैसे बच्चों की समस्याओं को सुधारती नहीं अपितु बढ़ती है। भूख का यह दर्द कितना कितना गहरा है 'समाज को बदल डालो ' का गीत देखिए
"अम्मा एक रोटी दे दे
बाबा एक रोटी दे दे
भूखे बच्चे मांग रहे हैं, हाथ पसार के
एक नहीं तो आधी दे दे
रूखी सूखी रोटी दे दे "
नन्हे मुन्ने फिल्म की छोटी बालिका शकुंतला अपने अनाथ छोटे तीनों भाइयों के विषम से विषम परिस्थिति में लालन पालन करती है। फिल्म बहुत बहुत गहरे से सोचने को मजबूर करती है। गुरुदेव रवींद
्रनाथ टैगोर की कहानी पर आधारित काबुलीवाला को बाल मनोविज्ञान की बहुत ही उम्दा फिल्म कही जा सकती है। 'दोस्ती' के सुनील और सुधीर अंधे और लंगड़े बालक हैं। यह फिल्म उनकी प्रगाढ़ दोस्ती के साथ-साथ विकलांगता का गहरा अभिशाप दिखलाती है। इसी प्रकार किताब , दो बीघा जमीन ,अनोखा बंधन, रानी और लालपरी , कुंवारा बाप, सफेद हाथी, मासूम, बाल फिल्म सोसाइटी द्वारा निर्मित अंकुर, मैना, कबूतर, विशाल भारद्वाज की ब्लू अंब्रेला, मकड़ी, नागेश कुकुनूर की इकबाल, धनक आमिर खान की तारे जमीन पर व सीक्रेट सुपरस्टार ,अजय देवगन की राजू चाचा, सलमान खान की चिल्लर पार्टी आदि भी सराहनीय और उल्लेखनीय फिल्में हैं जिनमें बाल जीवन, अपने हर उस रूप में आकार पाता है जिनसे बाल्य जीवन की संवेदनाएं जुड़ी हुई रहती हैं।
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आमिर खान की फिल्म 'तारे जमीं पर' डिस्लैक्सिया से पीड़ित एक मंदबुद्धि बच्चे पर आधारित है। इस फिल्म ने कई कीर्तिमान स्थापित किए और डिस्लैक्सिया से पीड़ित बच्चे के मनोविज्ञान को बड़ी गंभीरता और सजगता से व्यक्त किया। आर. बल्कि की ' पा 'भी विशेष संदर्भित फिल्म है जो बीमारियों से या शारीरिक विकृतियों से त्रस्त मासूम बच्चों की मासूमियत को उठाती है। पा' का ऑरो एक तेरह साल का हंसता-खेलता इंटेलिजेंट बच्चा है जिसे 'प्रागेरिया' नामक बीमारी हो जाती है । जिसमे इंसान अपनी उम्र से पाँच-छह गुना बड़ा दिखाई देता है। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन ने बहुत ही उम्दा काम किया। कुछ ऐसी ही मनोवैज्ञानिक संवेदनाओं का जिक्र करती है भंसाली की 'ब्लैक ' फिल्म । फिल्म विषय से बहुत ही हट के था परंतु एक अंधी बच्ची का मन और आत्मिक संवाद उस गहरे बोध को रेखांकित करता है जो दिव्यांग बच्चों की मजबूरियां कही जा सकती है।
बहरहाल , अब मैं कुछ ऐसी फिल्मों का जिक्र करना चाहूंगा जो बाल जीवन के गहरे अभाव के कारण गरीबी और बेबसी उन्हें अपराध की ओर मोड़ देती है या फिर उनकी ऐसी मजबूरियां जो उन्हें भीख मांगने को विवश करती हैं।
राज कपूर की आवारा के बालक राज वह संकेत आज भी प्रासंगिक दिखलाई पड़ता है।-
" अपराध के कीड़े चोल के आसपास घूम रहे साहब और सैकड़ों हजारों बच्चे आसपास की चालों में रहकर रोजाना इन कीड़ों के शिकार हो रहे हैं । मेरी फिक्र ना कीजिए जज साहब। उन बच्चों की फिक्र कीजिए । (फिल्म आवारा)
इरफान कमल की 'थैंक्स माँ 'कुछ ऐसे ही नाजुक संदर्भों को उठाती है । सलमान, मुंसीपाल्टी, सोडाभाई और सुरसुरी चारों बच्चे अनाथ हैं। अत्यंत गरीबी के कारण पॉकेट मारते हैं। बीड़ी सिगरेट पीते हैं। परंतु उनकी अंतरात्मा स्वच्छ है। एक दूधमुहीं बच्ची को सड़क के किनारे उठाकर वह चारों उसका लालन पालन करते हैं। फिल्म के कई मोड़ दर्शक को अंदर तक झकझोर देते हैं।
ऐसी ही एक फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनियर' जिसे ऑस्कर भी मिला। फिल्म का कंटेंट चाहे कुछ भी रहा हो परंतु इसके केंद्र में जमाल ,सलीम और लतिका के माध्यम से फिल्मकार ने बच्चों की तस्करी , बच्चों से भीख मंगवाने वाला गिरोह, किस कदर हैवानियत के साथ इनके अबोध बचपन से खेलता है।आपकी हमारी आंखें खोल देती है फिल्म का एक बच्चा सूरदास उसकी दोनों आंखें जन्म से अंधी नहीं है बल्कि गिरोह का सरगना सूरदास की आंखों में इसलिए तेजाब डाल देता है की अंधे बालकों को सड़कों पर भीख ज्यादा मिलती है। फिल्म का यह सीन मन को उद्वेलित करता है, आँसू ला देता है। फिल्म के अनुसार देश में 270 बच्चे प्रतिदिन अनाथ छोड़ दिए जाते हैं। इन बच्चों की जिंदगी शहर की गुमनाम गलियों में गुजरती है और कुछ बच्चे आजीविका के लिए अपराध का रास्ता अपना लेते हैं। आंकड़े बताते हैं कि-
भारत में करीब 43 लाख से ज्यादा बच्चे बाल मजदूरी करते हुए पाए गए हैं। यूनिसेफ के मुताबिक, दुनियाभर के कुल बाल मजदूरों में 12 फीसदी की हिस्सेदारी अकेले भारत की है।
आज भारतीय परिदृश्य में बच्चों का एजुकेशन सिस्टम पूरी तरीके से व्यवसाय में तब्दील हो गया है इस स्थिति में गरीब बच्चों पर तो क्या बीती होगी ,अंदाजा लगाना मुश्किल है। अंग्रेजी मीडियम , हिचकी, पिचकू, आई एम कलाम, पाठशाला , नोटबुक, दोस्ती, चलो जीते हैं, राउंड आफ साइलेंस ,नोटबुक और अभी हाल ही में आई प्रकाश झा की 'परीक्षा' तमाम उन सवालों को उठाती हैं जिनके गिरफ्त में है हमारा एजुकेशन सिस्टम। भले ही सरकार गरीब बच्चों के लिए सभी स्कूलों में मुकम्मल व्यवस्था करें परंतु अमीरी और गरीबी के बीच पिस्ता उनका बचपन न केवल कुंठा का शिकार हो रहा है अपितु कई सवाल भी खड़े करता है । ये अनाथ, गरीब, बेबस बच्चे पढ़ना चाहते हैं परंतु आर्थिक मजबूरियां इनके पैरों की बेडियां बन जाती हैं।

नीलमाधव पांडा की आई एम कलाम कलाम की उन्नत और विकसित पठनीय मानसिकता दर्शाती है। गरीबी उसके पांव पीछे खींचती है। वह पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम से अति प्रभावित है। ढाबे पर काम करना उसकी मजबूरी है परंतु वह जी तोड़ मेहनत करके पढ़ना चाहता है। इसी प्रकार रिची मेहता की फिल्म 'सिद्धार्थ' सत्य कहानी पर आधारित फिल्म है जो बाल श्रम के शिकार बच्चों के भविष्य में झाँकती है। अश्विनी अय्यर की फिल्म 'निल्ल बट्टे सन्नाटा' कि वह मां, जो अपनी बच्ची को उस मलिन बस्ती से निकालकर खूब पढ़ा कर, बड़ा आदमी बनना देखना चाहती है परंतु बच्ची का माहौल उसे जकड़े रखता है। कहने का अभिप्राय है कि ये सब फिल्में बाल संवेदनाओं को, तमाम उन संदर्भों को बखूबी रूप से उठाती हैं जिन पर आज चर्चा की जानी चाहिए और ऐसे विषयों को और भी विचारणीय बनाती है।
क्या गरीब का बच्चा पढ़ लिख नहीं सकता? क्या उन्नत समाज उसे बराबरी का दर्जा नहीं दे सकता? क्या हिंदी और इंग्लिश मीडियम का यह असंतुलित माहौल बच्चों में कुछ कुंठा का भाव तो नहीं पैदा कर रहा? तमाम ऐसे सवालों के बीच पनपते ऐसे ही उल्लेखनीय भावों को फिल्मकारों उठाना चाहा जो इन भावनाओं को बल भी प्रदान करते हैं और आश्वस्त करते हैं कि आज भारतीय सिनेमा भले ही व्यवसायिक सांचे में ढल गया हो परंतु कुछेक फिल्मकार अपने सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ ऐसी फिल्मों को बनाते रहेंगे।
अंत में मैं कुछ ऐसी फिल्म का जिक्र करना चाहूंगा जो बाल मन पर मनोवैज्ञानिक बढ़ते प्रभाव को इंगित करती हैं कि परिस्थितियां कब और कहां बच्चों के जीवन को तोड़ के रख दी थी हैं। बढ़ते एकिक परिवार के चलन ने बच्चों के जीवन को एकाकी बना दिया है। बच्चों की दिनचर्या स्कूल ट्यूशन और टीवी और मोबाइल तक सीमित होकर रह गई है। मल्टी स्टोरी फ्लैट्स में रहना उनकी बाल आकांक्षाओं और भी सीमित कर रहा है।
विनोद कापरी की 'पीहू' एक ऐसी ही मार्मिक फिल्म है जो पति पत्नी के बीच उपस्थित झगड़े के उपरांत बच्चे के पड़ने वाले प्रभाव को बहुत गहरे से विश्लेषित करती है । पीहू के पिता पत्नी से झगड़ा करके कुछ दिनों के लिए बाहर चले जाते हैं ।पीछे से उसकी मां गुस्से और तनाव में नींद की बहुत ज्यादा गोलियां ले लेती है जो अपनी मृत्यु तक ले जाता है। अबोध कुछ नहीं समझ पाती। उसे लगता है उसकी मां सो रही है। वह उसे उठाती है, बार-बार झकझोरती है। परंतु उसे क्या पता कि उसकी मां मर चुकी बेचारी भूखी है। प्यासी है। फिल्म के ये दृश्य आपकी आंखों में आंसू ला देते हैं । कहने का अभिप्राय यह है कि ऐसी परिस्थितियों में ऐसे बच्चों पर क्या बीतती होगी। फिल्म ऐसे बहुत से बहुत गहरे सवाल छोड़ती है।
सोमेंद्र पादी की राष्ट्रीय अवार्ड नॉमिनी फिल्म बुधिया एक तरफ गरीबी की गहरी दास्तान है तो दूसरी उस दबाव को भी रेखांकित करती है जिस दबाव में उसका बचपन दब जाता है।
अतःबच्चों को लेकर बनी ये फिल्में बॉक्स ऑफिस पर व्यावसायिक रूप तो खास रूप से सफल नहीं हो सकी। परंतु इनका विश्लेषणात्मक प्रभाव समाज पर गहरे से पड़ा इनका सकारात्मक प्रभाव भी समाज पर पड़ा है। कह सकते हैं कि इन फिल्मों के कारण बच्चों के प्रति हमारा नजरिया बदला है। बाल फिल्मों को सिर्फ मनोरंजन की दृष्टि से आँकना सही न होगा। जरूरत इस बात की है कि हम पश्चिम से कुछ सीखें। भारतीय हिंदी फिल्मों की यह त्रासदी है कि यहाँ बच्चों की फिल्मों को उतना महत्व नहीं दिया जाता जितना उसे मिलना चाहिए और न ही उसे गंभीरता से ही लिया जाता है।

डा० राकेश रायपुरिया
राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर
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