संगीतकार वसंत देसाई के संगीतबद्ध गीतों की रोशनी फिल्म जगत की सतरंगी दुनिया को हमेशा करेगी रोशन

नई दिल्ली । फिल्मी दुनिया को सजाने संवारने वाले महान संगीतकार बसंत देसाई के संगीतबद्ध गीतों की रोशनी फिल्म जगत की सतरंगी दुनिया को हमेशा रोशन करती रहेगी। वर्ष 1914 में गोवा के कुदाल में जन्में बसंत देसाई को बचपन के दिनों से ही संगीत के प्रति रूचि थी। कुछ वर्ष के बाद वह अच्छी शिक्षा के लिये अपने मामा के पास महाराष्ट्र आ गये। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह रंगमंच से जुड गये और नाटकों में अभिनय करने लगे। नाटकों से प्राप्त आय से उन्होंने एक पुराना हारमोनियम खरीद लिया और उससे शास्त्रीय संगीत का रियाज करना शुरू कर दिया।
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वर्ष 1929 में बसंत देसाई महराष्ट्र से कोल्हापुर आ गये। वर्ष 1930 में उन्हें प्रभात फिल्म्स की मूक फिल्म खूनी खंजर में अभिनय करने का मौका मिला। वर्ष 1932 में बसंत देसाई को अयोध्या का राजा में संगीतकार गोविंद राव टेंडे के सहायक के तौर पर काम करने का मौका मिला। इन सबके साथ हीं उन्हें इस फिल्म में के लिये गाने का भी मौका मिला। गीत के बोल कुछ इस प्रकार के थे जय जय राजाधिराज इस बीच बसंत देसाई फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिये संघर्ष करते रहे। वर्ष 1934 में प्रदर्शित फिल्म अमृत मंथन में गाया उनका यह गीत बरसन लगी श्रोताओं के बीच काफी लोकप्रिय हुआ।

इसके बाद बसंत देसाई ने पार्श्वगायन के बजाये संगीतकार में अपना रुख कर लिया। इसके बाद उन्होंने उस्ताद आलम खान और उस्ताद इनायत खान से संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी। लगभग चार वर्ष तक बसंत देसाई मराठी नाटकों में भी संगीत देते रहे। वर्ष 1942 में प्रदर्शित फिल्म शोभा के जरिये बतौर संगीतकार बसंत देसाई ने अपने सिने कैरियर की शुरूआत की लेकिन फिल्म की असफलता से वह संगीतकार के तौर पर अपनी पहचान नहीं बना सके।

बसंत देसाई इसके पूर्व वी. शांताराम की खूनी खंजर, अयोध्या का राजा, धर्मात्मा और अमर ज्योति जैसी फिल्मों में अभिनय कर चुके थे। इसके साथ हीं वी. शांताराम बसंत देसाई के संगीत बनाने के अंदाज से भी प्रभावित थे। वी. शांताराम ने यह निश्चय किया कि इस बार फिल्म का संगीत बंसत देसाई का होगा। उन्होंने बसंत देसाई को अपने पास बुलाया और अपनी फिल्म शकुंतला में संगीत देने की पेशकश की। इस फिल्म ने सफलता के नये कीर्तिमान स्थापित किये। फिल्म ने लगातार 104 सप्ताह तक चलने का रिकार्ड बनाया। फिल्म शकुंतला की सफलता के बाद बसंत देसाई संगीतकार के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गये।
वर्ष 1957 में बंसत देसाई के संगीत निर्देशन में ‘दो आंखे बारह हाथ’ का यह गीत गीत ऐ मालिक तेरे बंदे हम आज भी श्रोताओं के बीच आज भी काफी लोकप्रिय है इस गीत की लोकप्रियता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि पंजाब सरकार ने इस गीत को सभी विद्यालयों में प्रातःकालीन प्रार्थना सभा में शामिल कर लिया।वर्ष 1964 में प्रदर्शित फिल्म यादें बसंत देसाई के करियर की अहम फिल्म साबित हुयी। इस फिल्म में बसंत देसाई को यह जिम्मेदारी दी गयी थी कि फिल्म के पात्र के निजी जिंदगी के संस्मरणो को बैकग्रांउड स्कोर के माध्यम से पेश करना। बसंत देसाई ने इस बात को एक चुनौती के रूप में लिया और सर्वश्रेष्ठ बैकग्राउड संगीत देकर फिल्म को अमर बना दिया।
हमेशा अपने संगीत से श्रोताओं को कुछ नया देने वाले बसंत देसाई ने फिल्म आशीर्वाद में अभिनेता अशोक कुमार को रेल गाडी रेल गाडी गाने का मौका दिया। फिल्म का यह गीत बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय साबित हुआ। बसंत देसाई ने हिंदी फिल्मों के अलावा लगभग 20 मराठी फिल्मो के लिये भी संगीत दिया जिसमें सभी फिल्में सुपरहिट साबित हुयी। 22 दिंसबर 1975 को एच.एम.भी स्टूडियो से रिकार्डिग पूरी करने के बाद वह अपने घर पहुंचे। जैसे हीं उन्होंने अपने अपार्टमेंट की लिफ्ट में कदम रखा किसी तकनीकी खराबी के कारण लिफ्ट उन पर गिर पड़ी और उन्हें कुचल डाला जिससे उनकी मौत हो गयी। बसंत देसाई ने लगभग चार दशक अपने सिने करियर में महज 46 फिल्मों को संगीतबद्ध किया।
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